हिंदी कविता- आज के बच्चों का बचपन

आज के बच्चों का बचपन
बचपन अब वो कहां रहा,
जहां मिट्टी में खेला मज़ा रहा।
न रेत के किले, न गुलेल की बात,
मोबाइल और स्क्रीन ने छीन ली रात।
न वो अमराई, न छुपन-छुपाई,
गली-मोहल्लों में भी शांति छाई।
साईकिल की घंटी, पतंगों की दौड़,
सब खो गए, रह गया ये शोर।
बटन दबाते, गेम खेलते हैं,
वर्चुअल दुनिया में खो जाते हैं।
न पेड़ की छांव, न धूप का संग,
घर के कोने में सिमट गए उनके रंग।
कहां वो मटके का ठंडा पानी,
और दादी की प्यारी कहानी?
अब स्क्रीन पर हैं सारे खेल,
बचपन की खुशी में लग गए ठेल।
पर बचपन को फिर से लौटाना है,
बच्चों को असली जीवन सिखाना है।
पेड़ों के नीचे बैठ कहानियां सुनाएं,
खेल-कूद के साथ सपने सजाएं।
आज के बच्चों को यह समझाएं,
कि असली खुशी रिश्तों में छिपी पाएं।
स्क्रीन नहीं, यह जीवन रंगीन,
बचपन को दें फिर से उसकी जमीन।
