हिंदी कविता- मोबाइल और बच्चे

मोबाइल और बच्चे
छोटे-छोटे नन्हे हाथ,
पकड़े मोबाइल दिन और रात।
खेल-खेल में सीख गए चालाकी,
भूल गए किताबें, छूट गई नटखट प्यारी शरारती।
आंखें थकें, मन भी भारी,
सपनों में भी मोबाइल की सवारी।
मां-बाप की बातें अब सुनी न जातीं,
मोबाइल की दुनिया ही बन गई साथी।
खेल के मैदान अब सूने पड़े,
दोस्ती के रिश्ते दूर खड़े।
कहानी, किस्से, सब खो गए,
मोबाइल में ही बचपन सो गए।
आओ, मिलकर सोच बदलें,
बच्चों को किताबों से जोड़ें।
खेलों के संग जिंदगी महकाएं,
मोबाइल से थोड़ा वक्त बचाएं।
बचपन है अनमोल खजाना,
ना छीनो उनसे ये सुहाना।
मोबाइल को सीमा में रखना सिखाएं,
जीवन को खुशियों से सजाएं।
