नौकरी का खेल, कविता

नौकरी है जीवन का मेला,
सपनों की गठरी, मेहनत का ढेला।
सुबह-सुबह है दौड़ लगानी,
फिर भी सैलरी आधी पानी।
बॉस के हुक्म, काम का पहाड़,
फिर भी चेहरे पर हो मुस्कान।
छुट्टी मांगो तो लंबी बहस,
ओवरटाइम करो तो ना कोई तरस।
पर नौकरी भी है बड़ी कमाल,
सीखा दे दुनिया के सारे हाल।
मेहनत, सब्र, और थोड़ा जज्बा,
कर दे ज़िंदगी खुशहाल!
by Sunil Prakash
