“कलियुग का सच” कविता
कलियुग का सच
धर्म की बातें अब किताबों में रह गई,
सच बोलने की कसम भी मज़ाक बन गई।
मूल्य जहाँ बिकते हैं बाज़ारों में,
वो युग है ये – कलियुग की धाराओं में।
संत भी अब टीवी पर बिकते हैं,
अंधभक्ति में लोग आँखें सिला लेते हैं।
धोखा यहाँ रिश्तों का दूसरा नाम है,
माँ-बाप भी अब बोझ का सामान हैं।
पैसे के पीछे भागती दुनिया ये,
इंसानियत कब की दम तोड़ चुकी है।
लाशों पर भी अब सौदे होते हैं,
न्याय भी अमीरों के बोली में खोते हैं।
सत्य पर असत्य का पहरा है,
हर चेहरा अब बस एक चेहरा है।
नेता, साधु, व्यापारी एक जैसे हैं,
सभी अपने मतलब के परदे जैसे हैं।
पर फिर भी आशा की एक लौ बाकी है,
हर रात के बाद सुबह आती है।
कलियुग है, पर अंत नहीं कहानी का,
एक दीप जला ले, शुरुआत है प्रकाश की वाणी का।
